डेमोग्राफिक चेंज पर मोदी सरकार ने बनाई हाई लेवल कमेटी, शाह बोले- घुसपैठ वर्तमान और भविष्य के लिए बड़ी चुनौती
Modi Government Constitutes High-Level Committee
नई दिल्लीः केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने मंगलवार को देश भर में होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (Demographic Changes) का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है. इस अध्ययन में अवैध प्रवासियों के कारण आबादी में होने वाले बदलावों को भी शामिल किया जाएगा. सरकार ने यह कदम शासन व्यवस्था, सार्वजनिक सेवाओं, सीमा सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ने वाले इसके असर को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उठाया है.
'उच्च-स्तरीय जनसांख्यिकीय परिवर्तन समिति' नाम की इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नावलेकर करेंगे. समिति के चार अन्य सदस्यों में जनगणना आयुक्त, पूर्व आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा, पूर्व आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव और अर्थशास्त्री शमिका रवि शामिल हैं. गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव (विदेशी-I) इस समिति के सदस्य सचिव के रूप में अपनी सेवाएं देंगे.
समिति को एक साल के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है. गृह मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है कि समिति का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा और मंत्रालय इसके कामकाज के लिए आवश्यक सभी प्रशासनिक, लॉजिस्टिक और सचिवीय सहायता प्रदान करेगा.
इस संबंध में गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि समिति को देश भर में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों की "प्रकृति, कारणों और परिणामों" की जांच करने तथा इस समस्या से निपटने के लिए नीतिगत, प्रशासनिक और कानूनी उपायों की सिफारिश करने का जिम्मा सौंपा गया है.
अधिसूचना के अनुसार, सरकार ने यह पाया कि कुछ क्षेत्रों में आबादी का यह बदलाव "सामान्य प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) या मृत्यु दर के रुझान" के कारण नहीं है. इसके बजाय, यह "अवैध अप्रवासन (घुसपैठ), आबादी की अनियंत्रित आवाजाही और प्रशासनिक ढिलाई जैसे बाहरी असामान्य कारकों" के कारण उभर रहा है.
मंत्रालय ने कहा कि ऐसे बदलाव शुरुआत में सीमावर्ती जिलों तक ही सीमित थे, लेकिन अब ये शहरी केंद्रों, औद्योगिक क्षेत्रों, आदिवासी क्षेत्रों और अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से संवेदनशील इलाकों में फैल गए हैं. सरकार ने यह भी उल्लेख किया कि ये जनसांख्यिकीय परिवर्तन सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच, स्थानीय शासन, संसाधनों के वितरण और सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर रहे हैं.
समिति को मंत्रालयों, विभागों, राज्य सरकारों, सार्वजनिक प्राधिकरणों और व्यक्तियों से जानकारी तथा रिकॉर्ड मांगने के लिए व्यापक अधिकार दिए गए हैं. यह अपने काम के दौरान उप-समितियां भी बना सकती है और सुरक्षा एजेंसियों, स्थानीय सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों तथा सामाजिक संगठनों से सलाह ले सकती है.
समिति को सौंपे गए काम के नियमों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारणों का अध्ययन करना शामिल है, जैसे कि प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) में भिन्नता, सीमा पार से आवाजाही, अवैध अप्रवासन, आर्थिक प्रवास और सामाजिक-पर्यावरणीय कारक. समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के बीच जनसंख्या के ढांचे में होने वाले संरचनात्मक बदलावों की भी जांच करेगी, विशेष रूप से वहां जहां आबादी के रुझान व्यापक राष्ट्रीय पैटर्न से काफी अलग हैं.
समिति के मुख्य जनादेशों में से एक देश में रह रहे अवैध प्रवासियों की कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध पहचान, उन्हें हिरासत में लेने (डिटेंशन) और उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए एक "सुनियोजित और स्थायी परिचालन प्रणाली" की सिफारिश करना है. पैनल को सीमा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए संस्थागत तंत्र, जनसंख्या स्थिरीकरण के उपायों और जनसांख्यिकीय रुझानों की दीर्घकालिक निगरानी के लिए पहचान प्रणाली का सुझाव देने का काम भी सौंपा गया है.
इसके अतिरिक्त, यह समिति अवैध अप्रवासन और जनसांख्यिकीय असंतुलन से जुड़े मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल को बेहतर बनाने के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचा का प्रस्ताव देगी. ऐसा माना जा रहा है कि समिति की सिफारिशें भविष्य में सीमा सुरक्षा, प्रवासन प्रबंधन, पहचान सत्यापन प्रणाली और जनसंख्या डेटा निगरानी से जुड़ी नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं.
बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में अपने भाषण के दौरान भारत के जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ने के लिए घुसपैठियों द्वारा की जा रही "सुनियोजित साजिशों" के प्रति आगाह किया था. उन्होंने कहा था कि इस तरह की हरकतें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं और देश के युवाओं की आजीविका को नुकसान पहुंचाती हैं.